टीम NBT की यह रिपोर्ट ऐसे ही ‘कोल्ड वॉरियर्स’ के बारे में है, जिनकी ड्यूटी के आगे ठंड भी बेअसर हो जाती है। उनकी मेहनत और लगन सराहनीय है, जो कड़ाके की ठंड में भी लोगों की सेवा के लिए तत्पर रहते हैं।

1-ट्रैफिक पुलिस
‘ठंड की टेंशन नहीं, लोगों को बेहतर सेवा देना हमारी प्राथमिकता’
‘जब हम नौकरी जॉइन करते हैं, तब मौसम की परवाह नहीं करते। दिल्ली की कड़ाके की ठंड किसी से छिपी नहीं है, लेकिन जब हम सड़क पर लोगों की मदद करते हैं, तो एक बेहद सुखद अहसास होता है।’ यह कहना है तिमारपुर ट्रैफिक सर्कल के इंस्पेक्टर संतोष कुमार का। इंस्पेक्टर संतोष कुमार ने बताया कि ट्रैफिक पुलिस की ड्यूटी सुबह 7 बजे से शुरू होकर रात 11 बजे तक चलती है। किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए रात में एक ‘जेडीओ’ (JDO) तैनात रहते हैं। उन्होंने साझा किया कि सर्दियों में जब गाड़ियां सड़क से तेज रफ्तार में गुजरती हैं, तो उनके साथ आने वाली हवा के ठंडे थपेड़े शरीर को लगते हैं, जो चुनौती को और बढ़ा देते हैं।
ठंड से बचाव के बारे में उन्होंने बताया कि विभाग की ओर से पूरी सुविधाएं दी जाती हैं, लेकिन खुले आसमान में दिक्कत तो होती है। जब हम ड्यूटी पर होते हैं, तो ठंड की चिंता पीछे छूट जाती है। संतोष कुमार के अनुसार, उस वक्त उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता यह होती है कि लोग जाम में न फंसें, किसी को भी रास्ते में मुश्किल का सामना न करना पड़े, हर यात्री सुरक्षित और समय पर अपने गंतव्य तक पहुंच सकें।
2-डिलिवरी बॉय
‘ठंड में बाइक से डिलिवरी आसान नहीं, लेकिन…’
कड़ाके की ठंड में बाइक से सामान समय पर डिलिवर करना कोई आसान काम तो नहीं है, लेकिन पेट पालने के लिए करना पड़ता है। यह तकलीफ है स्विगी के लिए फूड डिलिवरी करने वाले राम कुमार की। राजापुरी में रहने वाले राम कुमार कहते हैं कि पहले थोड़ा ठीक था। 5 किमी के दायरे में सामान डिलीवरी के लिए 50 मिनट मिलता था। लेकिन, अब 15 मिनट कम कर दिया गया है। इससे चैलेंज काफी बढ़ गया है। दिन में थोड़ा ठीक भी रहता है, लेकिन रात जैसे-जैसे बढ़ती है, कोहरा बढ़ने लगता है और स्थिति और भी खराब हो जाती है। रात में ठंड भी ज्यादा होती है।
‘चुनौतियों के बाद भी सामान समय पर पहुंचाना लक्ष्य’
ठंड पहले की तुलना में काफी बढ़ गई है और सामान की डिलिवरी करना बेहद चुनौती भरा है। चाहे जितने गरम कपड़े कोई पहन ले, लेकिन देर रात बाइक से चलने पर ठंड तो काफी लगती है। एक ऑनलाइन फूड कंपनी के लिए डिलिवरी करने वाले विक्रांत कुमार के सामने भी कई दिक्कतें आती हैं, लेकिन वह काम से छुट्टी नहीं लेते हैं। वह कहते हैं कि ठंड की वजह से सर्दी-जुकाम है, नाक से हमेशा पानी बहता रहता है। इतनी चुनौतियों और मुश्किलों के बाद भी एक ही लक्ष्य होता है समय पर सामान की डिलिवरी। अब डिलिवरी के लिए टाइमिंग कम हो गई है तो दिक्कतें और बढ़ गई हैं। लेकिन काम के लिए ये सब करना पड़ता है।
3-डीटीसी बस ड्राइवर
‘हम तड़के नहीं निकलेंगे तो दूसरे ऑफिस लेट पहुंचेंगे’
‘मैं डीसीसी में ड्राइवर हूं और मेरी ड्यूटी रानी खेड़ा डिपो से शुरू होती है। सुबह 5:30 बजे की पहली ड्यूटी है, इसके लिए अलीपुर अपने घर से मुझे सुबह 5 बजे ही निकलना होता है। घर से डिपो तक पहुंचने के लिए मैं अपनी बाइक का इस्तेमाल करता हूं।’ डीटीसी बस ड्राइवर कमल बताते हैं कि सुबह इतनी अधिक ठंड होती है कि कई बार तो कोहरे की वजह से कपड़े तक भीग जाते हैं। इसके लिए मैं एक एक्स्ट्रा कपड़ा और खासकर जुराब लेकर चलता हूं। लेकिन उससे पहले नहाने धोने के लिए भी सुबह 4 बजे तक उठ जाना होता है। सुबह ठंड बहुत होती है, लेकिन ड्यूटी भी हमारे लिए प्राथमिकता होती है। अगर हम नहीं निकलेंगे तो कई लोग समय पर ऑफिस नहीं पहुंच पाएंगे।
4-बस कंडक्टर
‘रात को बाइक से घर लौटना काफी कठिन’
‘मेरी नजरों में ड्राइवर से भी बढ़कर एक कंडक्टर की जिम्मेदारी है। जिस दिन डिपो के अंदर कंडक्टर की कमी होती है, उस दिन अधिकांश बसें डिपो से बाहर नहीं निकल पाती हैं, क्योंकि हमें यात्रियों की जिम्मेदारी के साथ-साथ रेवेन्यू भी सरकार को कलेक्ट करके देना होता है।’ यह कहना है कि डीटीसी बस कंडक्टर अख्तर का। वह कहते हैं कि मेरी ड्यूटी शाम की शिफ्ट की है, घर से शाम को 3:30 बजे निकलता हूं 4:00 बजे के बाद ड्यूटी शुरू होती है, लेकिन ड्यूटी खत्म होने के बाद डिपो लौटते समय रात 12 से 12:30 बज जाते हैं। उस टाइम इतनी ठंड होती है कि हाथ तक काम नहीं करते हैं, मेरे घर से करीब 3 किलोमीटर की डिस्टेंस पर डिपो है। मैं नरेला के सिंघोला डिपो में हूं ड्यूटी खत्म होने के बाद रात को बाइक से ही घर लौटना पड़ता है। दूसरों को बस से पहुंचाते हैं, लेकिन खुद बाइक से जाने की मजबूरी होती है। इससे चुनौती और बढ़ जाती है।
5-ऑटो ड्राइवर
‘ठंड से बचने का हर उपाय बेअसर, पर काम तो करना ही पड़ेगा’
‘इस ठंड से बचने का हर उपाय बेअसर है। कितने भी कपड़े पहन कर आओ, ऑटो चलाने पर ठंड सताएगी ही। अब क्या करें पेट पालना है तो काम तो करना ही पड़ेगा।’ यह कहना है द्वारका में रहने वाले ऑटो ड्राइवर अजय राय का। वह कहते हैं कि 3 से 4 डिग्री की ठंड में ऑटो चलाने में काफी दिक्कत होती है। जब थोड़ा समय मिलता है तो धूप में खड़े हो जाते हैं। वह कहते हैं कि रोज सुबह 6 से रात 12 बजे तक ऑटो चलाते हैं। अजय के घर में उनकी पत्नी और तीन बच्चे हैं। तीनों बच्चे पढ़ने वाले हैं। उनका कहना है कि ठंड तो पूरे दिसंबर और जनवरी परेशान करती है, पर काम नहीं छोड़ सकते। वह कहते हैं कि घर से चार लेयर कपड़े पहन कर आते हैं, हवा से बचने के लिए कंबल लेते हैं। इसके बावजूद ठंड परेशान करती है।
6-न्यूजपेपर वेंडर
’35 सालों से जिम्मेदारी से कर रहा हूं काम’
सर्द सुबह। धुंध में लिपटी गलियां। दरवाज़ों के बाहर पड़ा अखबार और अंदर रजाई में दुबके लोग। चाय की पहली चुस्की के साथ जैसे ही पन्ने पलटते हैं, एक पूरी दुनिया आंखों के सामने खुल जाती है। लेकिन इस दुनिया को आपके दरवाज़े तक पहुंचाने वाला चेहरा अक्सर अनदेखा रह जाता है। यह संघर्ष है न्यूजपेपर वेंडरों की। संगम विहार में रहने वाले राजेंद्र 35 साल से यह काम कर रहे हैं। वह कहते हैं कि इन दिनों सुबह कड़ाके की ठंड है, लेकिन अखबार तो पहुंचाना ही है। बीते 35 साल से अब तक मैंने शायद ही कोई छुट्टी ली हो। परिवार में दो बेटी व दो बेटे हैं। बेटिया अब बड़ी हो गई हैं। उनकी शादी के लिए रुपये जोड़ रहा हूं। रोजाना सुबह 3.30 बजे उठता हूं। पहले आरके पुरम में अखबार आता था। अब मुनिरका में आता है। यहां से अखबार उठाकर घर-घर अखबार पहुंचाता हूं।
