जनकपुरी हादसे के मृतक के परिवारवालों का रो रो कर बुरा हाल है। कमल के पिता ने कहा कि वह सिर्फ मेरा बेटा नहीं, मेरी लाठी था साहब, वह मेरा बोझ उठा रहा था।

परिवारवालों का बुरा हाल
कमरे के एक कोने में बैठे नरेश उसी जगह को देख रहे हैं, जहां बैठकर 25 वर्षीय कमल अक्सर अपने सुनहरे भविष्य के सपने बुना करते थे। मां शांति देवी की नजरें दीवार पर टंगी कमल की तस्वीर पर जमी है, मानो वह अब भी लौट आने का इशारा कर दे। 27 साल की तपस्या और एक पल में उजड़ा संसारः मूल रूप से उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के रहने वाले नरेश चंद्र ध्यानी 40 साल पहले एक बेहतर भविष्य की तलाश में दिल्ली आए थे।
कमल के कंधों पर थी पूरी जिम्मेदारी
संघर्षों के बीच उन्होंने कैलाशपुरी की गली नंबर-4 के एक मंदिर को ही अपना घर बना लिया और बीते 27 वर्षों से मंदिर की सेवा और पंडिताई करते हुए अपने तीन बेटों मयंक (27) और जुड़वा बेटों करण व कमल (25) को पाला। मयंक और करण के पास कोई स्थायी रोजगार नहीं था, लिहाजा पूरे घर की जिम्मेदारी कमल के कंधों पर थी।
अधूरी रह गई आखिरी इच्छा
एचडीएफसी बैंक में काम करने वाले कमल की तनख्वाह से ही घर का किराया, राशन और बुजुर्ग माता-पिता की दवाइयों का खर्च चलता था। वह न केवल घर का आर्थिक आधार था, बल्कि परिवार की हिम्मत भी था। नरेश बताते हैं कि 6 फरवरी को उनकी शादी की सालगिरह थी। हादसे से महज दो दिन पहले कमल ने मां के हाथ में 20 हजार रुपये रखे थे।
सालगिरह पर भजन-कीर्तन कराने की थी इच्छा
उसने उत्साह के साथ कहा था, ‘मां, इस बार सालगिरह पर घर में बड़ा भजन-कीर्तन कराएंगे और फिर सबको वैष्णो देवी लेकर जाऊंगा। पापा, इस बार हम ट्रेन से नहीं, फ्लाइट से चलेंगे। जल्दी जाएंगे और जल्दी लौट आएंगे।’ पिता की आंखें छलक उठती है, वह कहते हैं- ‘किसे पता था कि कमल की यह आखिरी इच्छा कभी पूरी नहीं होगी। जिस बेटे को गोद में खिलाया, उसी कलेजे के टुकड़े को कंधा देना पड़ा। एक पिता के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा ?
सिस्टम की लापरवाही और प्रशासनिक बेरुखी
हादसे के बाद पूरा परिवार गहरे सदमे में है, लेकिन उससे भी ज्यादा दुख उन्हें सिस्टम के रवैये से है। कमल के चाचा विकास ध्यानी सवाल उठाते है कि जिस सड़क पर हादसा हुआ, वहां न तो बैरिकेड थे और न ही जानलेवा गड्ढे को ढका गया था। हादसे के बाद आनन-फानन में दिखावटी इंतजाम किए गए ताकि प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से बच सके।
परिवार ने प्रशासन पर लगाया आरोप
परिवार का आरोप है कि घटना के दो दिन बीत जाने के बाद भी कोई नेता, वरिष्ठ पुलिस अधिकारी या प्रशासनिक नुमाइंदा उनका हाल जानने नही पहुंचा। कमल के चाचा राकेश ध्यानी कहते है, ‘यह कोई पहली घटना नहीं है। पहले भी हादसे हुए हैं, लेकिन कभी ठोस कदम नहीं उठाए गए। लोग मरते हैं और फाइले बंद हो जाती है। हमें जांच के बारे में भी मीडिया से ही पता चल रहा है। अगर परिवार के किसी सदस्य को सरकारी बेटे की नौकरी मिल जाए, तभी यह परिवार सम्मान के साथ जी पाएगा।’
यादों में जिंदा है सबका ‘मददगार’
पड़ोसी भी कमल की सादगी और मिलनसार स्वभाव को भूल नहीं पा रहे है। पास ही दुकान चलाने वाले मंजेश कहते हैं कि कमल बेहद समझदार और हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहने वाला लड़का था। बिजली दुकानदार रजीत बताते है कि हादसे की सुबह भी कमल से बात हुई थी। वह अक्सर बाइक मेरी दुकान के सामने खड़ी करता था। दिल्ली जैसे शहर मे इतनी लापरवाही देखकर डर लगता है।
कई सवाल जो अब भी बाकी हैं
बहरहाल, कमल की कमी हर किसी को खल रही है। एक ऐसा बेटा जो पूरे परिवार का सहारा था, अब सिर्फ यादो मे रह गया है। पीछे रह गए है: टूटे हुए मां-बाप, अधूरे सपने और ऐसे सवाल, जिनके जवाब शायद सिस्टम के पास भी नहीं है। कमल जो हमेशा दूसरो की मदद के लिए खड़ा रहता था, हादसे के वक्त खुद मदद के लिए मोहताज हो गया… और यही इस कहानी का सबसे भयानक और डरावना सच है।
