राजधानी दिल्ली की यमुना में देशी मछलियों की संख्या को बढ़ाने के लिए कई काम किए जाएंगे। इसी कड़ी में एनजीटी ने सीपीसीबी को निर्देश दिया है।

एनजीटी ने दिए निर्देश
एनजीटी की प्रिंसिपल बेंच के अध्यक्ष जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव और एक्सपर्ट मेंबर डॉ ए सेनथिल वेल ने आदेश जारी करते हुए कहा कि नदी में देसी मछलियों की संख्या बढ़ाने और विदेशी प्रजातियों को नियंत्रित करने के लिए काम किया जाए। 2020-2024 के दौरान आईसीएआर-सीआईएफआरआई ने सर्वे में यमुना में 126 प्राजतियों की मछलियां पाई। रिपोर्ट में कहा गया कि देसी मछलियों जैसे कटला, रोहू, महासीर और ईल की संख्या कम हो रही है।
मछलियों की प्रजातियों का हुआ सर्वे
वहीं, खास तौर पर प्रदूषित हिस्से में विदेशी प्रजातियों जैसे कॉमन कार्प, नाइल टिलापिया और थाई मंगुर की संख्या बढ़ी है। एनजीटी ने कहा कि प्रदूषण, बांध का निर्माण, आवासीय बदलाव और अत्यधिक मछली पकड़ने के साथ जलवायु परिवर्तन भी इसकी वजह है। रिपोर्ट में यमनोत्री से प्रयागराज नदी में मछलियों की प्रजातियों का सर्वे किया गया। इसमें कुल 126 प्रजातियां मिलीं।
यहां पाई गई सबसे कम मछलियां
रिपोर्ट में सबसे कम मछलियां दिल्ली से मथुरा के बीच पाई गई। इस हिस्से में भी वजीराबाद से ओखला के बीच सबसे कम मछलियों की प्रजातियां मिली। यहां सिर्फ मंगुर मछली ही पाई गई। यह हिस्सा यमुना का सबसे प्रदूषित है। रिपोर्ट में कहा गया कि विदेशी मछलियां पर्यावरण के हिसाब से खुद को डाल लेती है और कई प्रकार के खाने पर जीवित रह सकती है। मांगुर मछली काफी कम ऑक्सीजन में भी जिंदा रह सकती है।
ITO पर मछलियां कम क्यों?
ITO यमुना का सबसे प्रदूषित हिस्सा है। यहां पर पानी का बहाव और पानी में ऑक्सिजन का स्तर करीब-करीब शून्य ही है। विदेशी प्रजातियो की बात करें तो जुलाई 2005 में प्रयागराज में पहली बार नील तिलापिया मछलियां पाई गई थी। शुरुआत में करीब 100 किलो मछलियां पकड़ी जाने लगी थी। 2010 तक यह बढ़कर 36.3 टन और 2014 और 2015 मे 10.13 टन और 25.28 टन हो गई। इस दौरान नील तिलापिया दिल्ली और प्रयागराज में पाई जाने वाली मछली की मुख्य प्रजाति बन गई थी।
