Delhi Night Shelter News: दिल्ली में शीतलहर का दौर जारी है। इस बीच बेघर लोगों के लिए बनाए गए रैन बसेरों की संख्या को लेकर चौंकाने खुलासा सामने आया है। नाइट शेल्टर्स की संख्या कागजों पर बड़ी दिखती है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है।

नाइट शेल्टर को लेकर ग्राउंड रिपोर्ट
दिल्ली सरकार की ओर से दावा किया गया है कि उनके पास 322 नाइट शेल्टर हैं। इनमें कुल 19,724 बिस्तर हैं। दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड (DUSIB) की वेबसाइट पर हर नाइट शेल्टर की क्षमता और वहां कितने लोग रह रहे हैं, इसकी जानकारी दी गई है। इन नंबरों को देखकर लगता है कि ठंड में किसी को भी बाहर नहीं सोना पड़ेगा। लेकिन जब आप इन शेल्टरों में जाकर देखेंगे तो हकीकत कुछ और ही मिलेगी।
दावा से काफी दूर है असल सच्चाई
जैसे, मोती खान के कमर्शियल बिल्डिंग नाइट शेल्टर की क्षमता 540 लोगों की बताई गई है। हालांकि, मंगलवार को वहां सिर्फ 15 बिस्तर ही मिले। यह किए जा रहे दावों से 3 फीसदी से भी कम है। अगर यह शेल्टर पूरी तरह भर भी जाए, तो हर बिस्तर पर 36 लोगों को एडजस्ट करना पड़ेगा, जो कि नामुमकिन है। शेल्टर के स्टाफ ने भी माना कि कुछ और गद्दे रखे जा सकते हैं, लेकिन 500 से ज्यादा लोगों को रखना बिल्कुल भी संभव नहीं है।
कागजों पर ज्यादा संख्या, जमीन पर सच्चाई अलग
कागजों पर भले ही लाखों लोगों के रहने की व्यवस्था हो, लेकिन असल में बहुत कम लोगों को ही इन शेल्टरों में जगह मिल पाती है। यह स्थिति दिल्ली में बेघर लोगों की समस्या की गंभीरता को दिखाती है। मोती खान वाले रैन बसेरे का कोड DUSIB की लिस्ट में 028 है। वहां मौजूद स्टाफ ने कहा कि यह इकलौता रैन बसेरा है जिसका यह कोड है। यही हमारी जगह है। उन्होंने यह बात ऐसे कही जैसे यह बताना नामुमकिन है कि बताई गई क्षमता को कैसे पूरा किया जा सकता है।
अलग-अलग नाइट शेल्टर का हाल जानिए
यह गड़बड़ी सिर्फ मोती खान में ही नहीं थी। चाबी गंज के वार्ड-I कम्युनिटी हॉल में 100 लोगों की क्षमता बताई गई थी, लेकिन वहां सिर्फ 38 बिस्तर मिले। एक कमरे में 22 और दूसरे में 16 बिस्तर थे। वहीं, इसके ऊपर वाले चाबी गंज कम्युनिटी सेंटर में 280 लोगों की क्षमता बताई गई थी, लेकिन वहां सिर्फ 6 फीसदी यानी 18 बिस्तर ही काम कर रहे थे। यमुना बाजार में 50 की क्षमता बताई गई थी, लेकिन वहां सिर्फ 19 बिस्तर ही तैयार थे, जो 38 फीसदी है।
दावे से कोसों दूर सच्चाई
मोरी गेट के गोल चक्कर में 50 की क्षमता बताई गई थी, लेकिन वहां भी सिर्फ 18 बिस्तर थे। इसी तरह, मजनू का टीला में 100 की क्षमता वाले कम्युनिटी हॉल में 20 बिस्तर थे। पहली मंजिल पर 50 की क्षमता वाले शेल्टर में 18-20 बिस्तर थे। एक और 50 की क्षमता वाले शेल्टर में सिर्फ 15 बिस्तर थे। कुछ कमरों में सैद्धांतिक रूप से पूरी क्षमता आ सकती थी, लेकिन न तो पर्याप्त बिस्तर थे और न ही गद्दे।
20 हजार बिस्तर के दावे की सच्चाई
सिर्फ टेंट ही ऐसे थे जिनमें 20 की क्षमता बताई गई थी और उतने ही बिस्तर भी थे। TOI की पड़ताल और स्टाफ से बातचीत में पता चला कि यह समस्या कोई नई नहीं है। पिछले दो-तीन सालों से सर्दियों में क्षमता करीब 19,000-20,000 बिस्तर बताई जाती रही है, और बताई गई क्षमता और असल में उपलब्ध बिस्तर के बीच का अंतर हमेशा बना रहा है। यह लगातार हो रही लापरवाही को दिखाता है।
क्या कह रहे अधिकारी
जब इस गड़बड़ी के बारे में बड़े सरकारी अधिकारियों को बताया गया, तो उन्होंने कार्रवाई का वादा किया। DUSIB के एक सीनियर अधिकारी ने कहा कि हम जरूर जांच करेंगे कि कहीं कोई गड़बड़ी तो नहीं है। ‘बिस्तर वाले’ और ‘बिस्तर रहित’ क्षमता की भी एक अवधारणा होती है – जब बिस्तर लगाए जाते हैं, तो इस्तेमाल करने लायक क्षमता कम हो जाती है, जबकि बिस्तर रहित जगहों पर ज्यादा लोग आ सकते हैं।”
