दिल्ली हाई कोर्ट ने राजधानी में आवारा कुत्तों की बढ़ती आबादी पर नियंत्रण पाने के लिए MCD को कम से कम एक वार्ड चुनकर पायलट प्रोजेक्ट के तहत नसबंदी और टीकाकरण कैंप लगाने का निर्देश दिया है।

लोगों को भी जागरूक करे एमसीडी
जस्टिस दिनेश मेहता और जस्टिस रजनीश कुमार गुप्ता की पीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि इस अभियान के लिए स्थानीय लोगों को अखबारों, होर्डिंग्स और कम्युनिटी डॉग फीडर्स के जरिए पहले से जागरूक किया जाए।
भ्रम दूर करने के लिए MCD करे ये काम
दिल्ली हाई कोर्ट ने मामले के सुनवाई के बाद निर्देश दिया कि प्रचार-प्रसार के दौरान प्लेकार्ड और बोर्ड्स पर साफ लिखा होना चाहिए कि कुत्तों को केवल नसबंदी और टीकाकरण के लिए ले जाया जा रहा है, न कि किसी ‘डॉग पाउंड’ में बंद करने के लिए। इससे स्थानीय निवासियों और पशु कल्याण स्वयंसेवकों के बीच किसी प्रकार का भ्रम या चिंता पैदा नहीं होगी।
पूरी प्रक्रिया लगता है कितना समय
सुनवाई के दौरान MCD ने हाई कोर्ट के बताया कि कुत्तों को कैंप में पकड़ने के बाद तय केंद्रों पर भेजा जाएगा, जहां पूरी प्रक्रिया में लगभग पांच दिन का समय लगता है, जिसके बाद उन्हें वापस उसी इलाके में छोड़ दिया जाता है। जब कोर्ट ने दिल्ली में आवारा कुत्तों की सही संख्या का डेटा मांगा, तो MCD ने बताया कि अभी तक कोई आधिकारिक पशु जनगणना नहीं हुई है, लेकिन अनुमानित आबादी लगभग 8 लाख है।
कुत्तों की आबादी का कोई आधिकारिक डेटा नहीं
इस पर अदालत ने सवाल उठाया कि बिना सटीक डेटा के नसबंदी अभियानों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन कैसे किया जाएगा। MCD ने स्पष्ट किया कि आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रित करने का एकमात्र असरदार तरीका नसबंदी ही है और उनका माइक्रोचिपिंग से जुड़ा पायलट प्रोजेक्ट सफल रहा है।
हाई कोर्ट ने दिया सुझाव
दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली नगर निगम को सुझाव दिया कि शहर के घने और अधिक कुत्तों की आबादी वाले क्षेत्रों से वार्ड चुनकर ‘वार्ड-वाइज’ रणनीति अपनाई जाए, ताकि सौ-प्रतिशत नसबंदी का लक्ष्य हासिल किया जा सके।

