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इस इतिहास को देखते हुए, इस साल मई में 11 छात्राओं के द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों पर JNU कैंपस का रिएक्शन “काफी धीमा” लगता है। छात्रों ने JNU की इंटरनल कंप्लेंट्स कमिटी (ICC) से संपर्क किया और गलत व्यवहार, यौन-संबंधी भद्दी बातें कहने और – खबरों के मुताबिक – यौन संबंध बनाने के बदले अच्छे नंबर देने का ऑफर मिलने जैसे आरोप लगाए। प्रोफेसर ने इन आरोपों से इनकार किया है और मामले की जांच चल रही है।
जुलाई के बीच में क्लास फिर से शुरू होने के बाद भी, शिकायतों की वजह से तुरंत कोई बड़ा या लंबा विरोध-प्रदर्शन नहीं हुआ। लोगों का ध्यान इस ओर कई महीनों बाद गया। आरोपी की पहचान मुख्यधारा की रिपोर्टिंग से दूर ही रखी गई है। ‘काम की जगह पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से जुड़े कानून’ की धारा 16 के तहत, ICC की कार्यवाही के दौरान शिकायत करने वाले, आरोपी और गवाहों की पहचान उजागर करने पर रोक है।
इसलिए, मुख्य अंतर किसी नाम के न होने में नहीं, बल्कि शिकायतों को लेकर लोगों के कम एकजुट होने में है। पहले के अभियानों की तरह क्लास का लंबे समय तक बहिष्कार, कैंपस में बड़े मार्च, पुलिस स्टेशन के बाहर प्रदर्शन या हफ्तो तक पोस्टर, पर्चे और आम सभा की बैठकें जैसी कोई चीज नहीं हुई।
JNU में महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे पर पहले भी ऐसी प्रतिक्रियाएँ देखने को मिली हैं। 16 दिसंबर 2012 की निर्भया घटना के बाद, सेंट्रल दिल्ली में विरोध प्रदर्शन में शामिल होने से पहले छात्रों ने वसंत विहार पुलिस स्टेशन और मुनिरका में प्रदर्शन किया था। यौन हिंसा, महिलाओं की आज़ादी और पुलिसिंग जैसे मुद्दों पर कैंपस में बैठकों के ज़रिए यह लामबंदी जारी रही।
एक साल बाद, एक प्रोफ़ेसर पर आठ महिलाओं के आरोपों ने पूरे कैंपस में एक बड़ा मुद्दा खड़ा कर दिया। छात्रों ने वसंत कुंज पुलिस स्टेशन के बाहर प्रदर्शन किया। इसके बाद 1,000 से ज़्यादा छात्रों और शिक्षकों ने संसद मार्ग की ओर मार्च किया, जहाँ उन्हें बैरिकेड्स, वॉटर कैनन और पुलिस की कार्रवाई का सामना करना पड़ा।
JNU में लंबे समय तक आंदोलन करने की क्षमता सिर्फ़ जेंडर से जुड़े मुद्दों तक ही सीमित नहीं रही है। 2004 में ताप्ती हॉस्टल के पास नेस्ले आउटलेट को लेकर कैंपस की जगह के “कॉर्पोरेटाइजेशन” पर बड़ा राजनीतिक विवाद हुआ। 2009 में बिजली मीटर, खाने-पीने की जगहों और प्रॉस्पेक्टस की कीमत 120 रुपये से बढ़ाकर 200 रुपये करने के विरोध में हड़तालें और मार्च हुए।
अक्टूबर 2016 में छात्र नजीब अहमद के लापता होने के बाद हफ़्तों तक प्रदर्शन हुए। एक समय तो प्रदर्शनकारियों ने वाइस-चांसलर और दूसरे अधिकारियों को एडमिनिस्ट्रेटिव बिल्डिंग के अंदर ही रोक दिया था। 2019 में हॉस्टल फ़ीस को लेकर हुआ आंदोलन हफ़्तों तक चला, जिससे दीक्षांत समारोह में रुकावट आई और HRD मिनिस्ट्री को बातचीत के लिए आगे आना पड़ा।
इस साल फ़रवरी में, फ़ेशियल-रिकग्निशन गेट्स के खिलाफ पहले हुए आंदोलन की वजह से JNUSU के सभी चार पदाधिकारियों को यूनिवर्सिटी से निकाले जाने पर पूरे कैंपस में हड़ताल हुई। हालांकि, 2023 से लागू नियमों की वजह से विरोध-प्रदर्शनों के लिए संभावित सज़ाएं कड़ी हो गई हैं। वहीं, इस मई में आई शिकायतों का असर भी कमज़ोर पड़ गया क्योंकि उसके ठीक बाद सेमेस्टर की छुट्टियां शुरू हो गईं।
ICC की जांच से जुड़ी गोपनीयता के कारण भी इस मामले पर सार्वजनिक चर्चा सीमित रही होगी। इन हालात से विरोध के कमज़ोर रहने की कुछ वजहें तो समझ आती हैं, लेकिन इससे यह पूरी तरह साफ़ नहीं होता कि क्लास दोबारा शुरू होने के बाद भी 11 शिकायतें कैंपस में कोई बड़ा और लगातार चलने वाला मुद्दा क्यों नहीं बन पाईं।