दिल्ली हाई कोर्ट में पति-पत्नी के बीच एक ऐसा मामला सामने आया जिसमें पति को अदालत से राहत मिल गई। पति ने पत्नी के पास एमबीए की डिग्री सहित आमदनी के कई जरिए बताए। पति ने कहा कि पत्नी कमाने में सक्षम है इसलिए गुजारा भत्ता कम किया जाए।

पति ने गुजारा-भत्ते की रकम को चुनौती क्यों दी?
कोर्ट के आदेश के मुताबिक, आशुतोष राय अस्थाना और यमिता राय अस्थाना की शादी 2 नवंबर, 1995 को हुई थी और उनके दो बच्चे भी हैं। दोनों के बीच आपसी मतभेद होने के बाद, यमिता ने 9 अप्रैल, 2021 को अपने पति से गुजारा-भत्ते की मांग की। फैमिली कोर्ट ने शुरू में 15 जनवरी, 2022 को उन्हें अंतरिम गुजारा-भत्ते के तौर पर 25,000 रुपये देने का आदेश दिया। लेकिन बाद में, 5 जून, 2024 को कोर्ट ने एक और आदेश जारी किया, जिसमें आशुतोष को गुजारा-भत्ते की अर्जी देने की तारीख से हर महीने 30,000 रुपये देने का निर्देश दिया गया।
आशुतोष ने हाई कोर्ट में आदेश को चुनौती दी
आशुतोष ने हाई कोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि वह दोनों बच्चों की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए जिम्मेदार थे, जिसमें उनकी बड़ी बेटी भी शामिल थी जो MBBS की पढ़ाई कर रही थी। उन्होंने यह भी कहा कि यमिता ने फाइनेंस में MBA किया था और वह कमाने में सक्षम थीं। उन्होंने बताया कि वह उनके खरीदे हुए घर में रह रही थीं और उन्हें किराए और फिक्स्ड डिपॉजिट से भी आमदनी होती थी।
उन्होंने आगे कहा कि उन्हें कई लोन चुकाने थे। हालांकि, पत्नी ने याचिका का विरोध किया और कहा कि फैमिली कोर्ट ने पति की आर्थिक स्थिति पर ठीक से विचार किया था। उन्होंने बताया कि उनकी सालाना आय 63 लाख रुपये से ज्यादा थी और उनका कार्गो का बिजनेस भी था।
दिल्ली हाई कोर्ट ने गुजारा-भत्ता (मेंटेनेंस) क्यों कम किया?
जस्टिस सौरभ बनर्जी ने देखा कि दोनों बच्चे पति के साथ रह रहे थे और वह उनकी पढ़ाई और दूसरे खर्च उठा रहे थे। कोर्ट ने यह भी देखा कि उनकी बेटी MBBS का कोर्स कर रही थी। कोर्ट ने आगे कहा कि यमिता अपने पति के खरीदे हुए तीन बेडरूम वाले घर में रह रही थीं। कोर्ट ने कहा कि वह अच्छी तरह से क्वालिफाइड थीं, उनके पास फाइनेंस में MBA की डिग्री थी और वह खुद कमाने में सक्षम थीं।
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट का दिया हवाला
कोर्ट ने कहा कि वह बहुत अधिक क्वालिफाइड और पढ़ी-लिखी महिला हैं, जिन्होंने फाइनेंस में MBA किया है और वह खुद कमाने में पूरी तरह सक्षम हैं। कोर्ट ने यह भी देखा कि यमिता को किराए से हर महीने 10450 रुपये और फिक्स्ड डिपॉजिट से हर महीने 4400 रुपये ब्याज के तौर पर मिल रहे थे। कोर्ट ने आगे कहा कि फैमिली कोर्ट से अंतरिम गुजारा-भत्ता मिलने से पहले ही आशुतोष अपनी मर्जी से उन्हें हर महीने 20000 रुपये दे रहे थे।
हाई कोर्ट ने ‘रजनीश बनाम नेहा’ मामले में सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का जिक्र किया। इन गाइडलाइंस के मुताबिक, गुजारा-भत्ता तय करते समय कोर्ट को दोनों पक्षों की आय और संपत्ति, पति पर निर्भर लोगों की संख्या, उसकी देनदारियों और भुगतान करने की क्षमता जैसे पहलुओं पर विचार करना होता है। हाई कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने इन पहलुओं पर विचार तो किया था, लेकिन 30000 रुपये प्रति माह का गुजारा-भत्ता तय करते समय उन्हें पर्याप्त महत्व नहीं दिया।

